कश्मीरी पंडितों में फिर खौफ: शाम 4 बजे से पहले घरों में कैद होने को मजबूर, ट्रांजिट कैंप बने जेल जैसे

कश्मीरी पंडितों में फिर खौफ: शाम 4 बजे से पहले घरों में कैद होने को मजबूर, ट्रांजिट कैंप बने जेल जैसे

घाटी में फिर खौफ का साया: शाम 4 बजे से पहले घरों में कैद होने को मजबूर कश्मीरी पंडित, ट्रांजिट कैंप बने ‘जेल’

कश्मीर घाटी में लक्षित हिंसा (टारगेट किलिंग) की आशंका और सुरक्षा कारणों के चलते कश्मीरी पंडित कर्मचारियों और उनके परिवारों में एक बार फिर गहरा खौफ फैल गया है। बडगाम के शेखपुरा, कुलगाम के वुस्सू, बारामूला और कुपवाड़ा स्थित ट्रांजिट कैंपों में रहने वाले कश्मीरी पंडित शाम ढलने से पहले ही अपने घरों में बंद होने को विवश हैं। कई कर्मचारियों ने डर के मारे दफ्तर जाना बंद कर दिया है, तो कुछ परिवार सुरक्षा के मद्देनजर घाटी से पलायन कर चुके हैं।

12 फीट ऊंची दीवारों के पीछे कैद जिंदगी

बडगाम जिला मुख्यालय से 3 किमी दूर शेखपुरा में कश्मीरी पंडितों की दूसरी सबसे बड़ी कॉलोनी है, जहां करीब 330 परिवार रहते हैं। 12 फीट ऊंची बाउंड्री वॉल और कंटीले तारों से घिरी यह कॉलोनी आज किसी जेल जैसी नजर आती है। गेट पर तैनात जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ कमांडोज हर आने-जाने वाले की सख्त जांच कर रहे हैं। कर्मचारियों को हर वक्त गले में आईडी कार्ड लटकाना पड़ता है और जवानों द्वारा स्पष्ट निर्देश हैं कि शाम 4 बजे से पहले हर हाल में वापस लौट आएं।

सपनों का पैकेज, डर की हकीकत

वर्ष 2008 के प्रधानमंत्री पैकेज के तहत करीब 6 हजार कश्मीरी पंडितों को घाटी में सरकारी नौकरी और ट्रांजिट आवास दिए गए थे। कई लोग 1990 के विस्थापन के बाद 2010 में इस उम्मीद के साथ लौटे थे कि वे अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ेंगे। लेकिन आज हालात यह हैं कि जब भी कॉलोनी का गेट खुलता है या कोई अनजान फोन बजता है, तो इन परिवारों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। चौबीसों घंटे सुरक्षा घेरे में रहने के बावजूद वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।